भारत में सिविक सेंस की कमी: ZERO CIVIC SENSE

ZERO CIVIC SENSE

हम जब भी विदेश से लौटकर आने वाले किसी रिश्तेदार या दोस्त से मिलते हैं, तो उनके मुंह से एक बात जरूर सुनते हैं— “भाई! वहां की सफाई तो देखने लायक है ।

​डेनमार्क के कोपेनहेगन जैसे शहरों की मिसाल लीजिए। वहां हर 5 मिनट की पैदल दूरी पर आपको एक चमकता हुआ पब्लिक टॉयलेट मिल जाएगा। लोग एस्केलेटर (चलती सीढ़ी) पर चलते वक्त भी एक तरफ लाइन में खड़े होते हैं ताकि जल्दी जाने वालों को रास्ता मिले। ट्रैफिक लाइट न भी हो, तो भी पैदल चलने वालों को देखकर गाड़ियां रुक जाती हैं।

​लेकिन जैसे ही हम भारत की किसी गली या चौराहे पर कदम रखते हैं, नज़ारा एकदम उलट होता है। सड़कों पर बिखरा कचरा, कान फाड़ देने वाला हॉर्न का शोर, और फुटपाथ पर चलने की जगह ही नहीं। आखिर ऐसा क्यों है?
क्या हम भारतीय जन्म से ही “असभ्य” हैं? जवाब है— बिल्कुल नहीं। समस्या हमारे खून या जीन में नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक ढांचे, सिस्टम की लापरवाही और हमारी सोच में है। आइए इसे गहराई से समझते हैं।

​जातिवाद और Classism: “सफाई मेरा काम नहीं है”

​भारत में सिविक सेंस की कमी का सबसे बड़ा और कड़वा सच है— हमारा सामाजिक ढांचा। हमने सदियों से सफाई के काम को एक खास जाति (Caste) से जोड़ दिया है।

• ​मानसिकता का बोझ: गांधी जी ने सफाई करने वालों को ‘मां’ का दर्जा दिया था क्योंकि एक मां की तरह वे समाज को गंदगी और बीमारियों से बचाते हैं। लेकिन विडंबना देखिए, आज भी हमारे समाज में ‘भंगी’ जैसे शब्दों को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। जब तक हम सफाई करने वाले इंसान को सम्मान नहीं देंगे, तब तक हम खुद सफाई की जिम्मेदारी कभी महसूस नहीं करेंगे।

• ​“कूड़ेवाला” कौन है?: हम सुबह घर के बाहर कचरा लेने आने वाले व्यक्ति को “कूड़ेवाला” कहते हैं। जरा सोचिए, कूड़ा तो हमने फैलाया है, वह तो “सफाईवाला” है। यह छोटी सी भाषा का फर्क हमारी पूरी मानसिकता को दर्शाता है। हम सोचते हैं कि हमने कचरा बाहर फेंक दिया, अब यह किसी और का काम है।

• ​भेदभाव की दीवारें: आज भी कई हाई-प्रोफाइल सोसायटियों में काम करने वाले गार्ड्स या हाउस-हेल्प के लिए अलग लिफ्ट और अलग बर्तन रखे जाते हैं। यह  classism(वर्गवाद) हमें सिखाता है कि कुछ लोग “गंदा” काम करने के लिए ही बने हैं। जब तक यह भेदभाव रहेगा, “साझा जिम्मेदारी” (Shared Responsibility) का भाव पैदा नहीं होगा।

​सरकारी सिस्टम की नाकामी: जब मजबूरी बन जाए आदत

​अक्सर कहा जाता है कि भारतीयों में सेंस नहीं है, लेकिन क्या कभी हमने गौर किया है कि हमारा सिस्टम हमें किस हाल में छोड़ देता है?

• ​टॉयलेट्स की हालत : सड़कों के साइड मे पेशाब करने वालों को हम कोसते तो हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि एक ऑटो ड्राइवर या रेहड़ी वाला व्यक्ति क्या करे? शहरों में पब्लिक टॉयलेट्स या तो होते नहीं, और अगर होते हैं तो उनमें पानी नहीं होता या ताला लगा रहता है। ऐसे में मजबूरी ही धीरे-धीरे आदत बन जाती है।

• ​इंजीनियरिंग की गलतियां: हमारे शहरों की प्लानिंग ऐसी है कि लोग चाहकर भी नियम नहीं मान पाते। फुटपाथों पर दुकानों का कब्जा है, सड़कों पर अचानक गड्ढे आ जाते हैं, और जेब्रा क्रॉसिंग का नामोनिशान नहीं होता। जब पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित रास्ता ही नहीं होगा, तो वे सड़क के बीच में ही चलेंगे।

• ​मेट्रो बनाम सड़क: गौर कीजिए, वही भारतीय जो सड़क पर थूकता है, दिल्ली मेट्रो या एयरपोर्ट के अंदर बिल्कुल तमीज से रहता है। क्यों? क्योंकि वहां सिस्टम साफ है, लाइटें अच्छी हैं, और वहां गंदगी फैलाना “अजीब” लगता है। इसे ‘हर्ड मेंटालिटी’ कहते हैं—जहां सब साफ है, वहां हम भी साफ रहते हैं। जहां पहले से कचरा है, वहां हमें एक रैपर फेंकने में झिझक नहीं होती।

​एम्पैथी (Empathy) की कमी: “मुझे क्या फर्क पड़ता है?”

​सिविक सेंस का सीधा संबंध हमारी ‘एम्पैथी’ यानी दूसरों के दर्द को समझने की क्षमता से है।

• ​अमीर और गरीब का अंतर: बड़े शहरों में करोड़ों के अपार्टमेंट्स के ठीक बगल में कचरे के पहाड़ होते हैं। अमीर लोग अपनी गाड़ियों के शीशे चढ़ाकर उस कचरे से मुंह फेर लेते हैं। उनके पास अपना प्राइवेट गार्डन और स्विमिंग पूल है, इसलिए उन्हें शहर की सड़कों की फिक्र नहीं है। उनमें “कम्युनिटी फीलिंग” की भारी कमी है।

• ​छोटे बदलावों की अनदेखी: सिविक सेंस का मतलब सिर्फ झाड़ू लगाना नहीं है। इसका मतलब है—रेस्टोरेंट में खाना खाने के बाद अपनी प्लेट्स को सलीके से छोड़ना ताकि वेटर को आसानी हो। इसका मतलब है—किसी मॉल या ऑफिस से निकलते वक्त पीछे वाले के लिए दरवाजा पकड़ना। जब हम दूसरों की सुविधा का ख्याल रखने लगते हैं, तभी हम एक बेहतर नागरिक बनते हैं।

​दुनिया के देशों से सबक: वे कैसे कामयाब हुए?

​विकसित देश आज साफ हैं क्योंकि उन्होंने सिस्टम और शिक्षा, दोनों पर काम किया:

• ​डेनमार्क का कचरा प्रबंधन: वहां कूड़े को 10 अलग-अलग डस्टबिन में बांटा जाता है। कांच अलग, प्लास्टिक अलग, खाना अलग। लोग खुद अपने घर पर इसे अलग करते हैं और रीसाइक्लिंग सेंटर तक खुद गाड़ी चलाकर छोड़ने जाते हैं।

• ​जापान का ‘ओसोजी’: जापान के स्कूलों में सफाई के लिए कोई अलग से कर्मचारी नहीं होता। बच्चे खुद अपने क्लासरूम, कॉरिडोर और टॉयलेट्स साफ करते हैं। इससे उन्हें बचपन से ही समझ आता है कि गंदगी साफ करना कोई छोटा काम नहीं, बल्कि गर्व की बात है।

• ​इनाम वाला सिस्टम: जर्मनी और डेनमार्क में ‘PANT’ सिस्टम चलता है। आप प्लास्टिक की बोतल स्टोर पर वापस करेंगे, तो आपको बदले में पैसे मिलेंगे। यानी वहां कचरा फेंकने में नुकसान है और वापस करने में फायदा।

​ समाधान: भारत को कैसे बदलें?

​हमें अब भाषणों से आगे बढ़कर असल बदलाव की जरूरत है:

• ​स्कूलों से शुरुआत: हमें बच्चों को केवल मैथ और साइंस नहीं, बल्कि ‘नागरिक शास्त्र’  सिखाना होगा। स्कूलों में बच्चों से पौधे लगवाए जाएं और उन्हें अपने आसपास की सफाई की जिम्मेदारी दी जाए।

• ​सख्त नियम और जुर्माना: डेनमार्क में नियम कड़े हैं। भारत में भी जुर्माना ऐसा होना चाहिए जिससे लोग डरे। लेकिन जुर्माना लगाने से पहले सरकार को डस्टबिन और साफ टॉयलेट्स की सुविधा देनी होगी।

• ​नेताओं की प्राथमिकता: हमारे नेताओं के चुनावी घोषणापत्र में अक्सर मंदिर-मस्जिद या फ्री की योजनाओं का जिक्र होता है, लेकिन ‘साफ हवा’ और ‘सलीके वाले शहर’ का मुद्दा गायब रहता है। हमें अपनी मांगें बदलनी होंगी।

Rio Opinion

​सिविक सेंस कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे डंडे के जोर पर रातों-रात सिखाया जा सके। यह एक सोच है, एक तहजीब है। जब हम सफाई करने वाले को “भैया” कहकर इज्जत देंगे, जब हम अपनी कार की खिड़की से चिप्स का पैकेट फेंकने से पहले सोचेंगे कि कोई इसे उठाएगा, और जब हम अपने शहर को अपना घर मानने लगेंगे—तभी भारत बदलेगा।

​हमारा देश तभी सुंदर बनेगा जब हमारी सोच सुंदर होगी। अगली बार जब आप बाहर निकलें, तो एक छोटा सा कदम उठाएं—अपना कचरा अपनी जेब में रखें जब तक कि डस्टबिन न मिल जाए। बदलाव आपसे ही शुरू होता है।

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